Chapter Progress
भौतिकी क्या है ?
प्रकृति में मूल बल
गुरुत्वाकर्षण बल
विद्युत चुम्बकीय बल
प्रबल नाभिकीय बल
दुर्बल नाभिकीय बल
आज हम क्या सीखेंगे ?
भौतिकी क्या है ?
प्रकृति में मूल बल
गुरुत्वाकर्षण बल
विधुत चुम्बकीय बल
प्रबल नाभिकीय बल
दुर्बलीय बल
भौतिकी क्या है ?
मानव की सदैव अपने चारों ओर फैले विश्व के बारे में जानने की जिज्ञासा रही है। अनादि काल से ही रात्रि के आकाश में चमकने वाले खगोलीय पिण्ड उसे सम्मोहित करते रहे हैं। दिन-रात की सतत पुनरावृत्ति, ऋतुओं के वार्षिक चक्र, ग्रहण, ज्वार-भाटे, ज्वालामुखी, इन्द्रधनुष सदैव ही उसके कौतूहल के स्रोत रहे हैं। संसार में पदार्थों के आश्चर्यचकित करने वाले प्रकार तथा जीवन एवं व्यवहार की विस्मयकारी विभिन्नताएँ हैं। प्रकृति के ऐसे आश्चर्यों एवं विस्मयों के प्रति मानव का कल्पनाशील तथा अन्वेषी मस्तिष्क विभिन्न प्रकार से अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करता रहा है। आदि काल से मानव की एक प्रकार की प्रतिक्रिया यह रही है कि उसने अपने भौतिक पर्यावरण का सावधानीपूर्वक प्रेक्षण किया है, प्राकृतिक परिघटनाओं में अर्थपूर्ण पैटर्न तथा संबंध खोजे हैं, तथा प्रकृति के साथ प्रतिक्रिया कर सकने के लिए नए औजारों को बनाया तथा उनका उपयोग किया है। कालान्तर में मानव के इन्हीं प्रयासों से आधुनिक विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
#प्रकृति में मूल बल#
हम सभी में बल के बारे में कोई सहजानुभूत धारणा है। हम सभी का यह अनुभव है कि वस्तुओं को धकेलने, ले जाने अथवा फेंकने, निरूपित करने अथवा उन्हें तोड़ने के लिए बलकी आवश्यकता होती है। हम अपने ऊपर बलों के संघात, जैसे किसी गतिशील वस्तु के हमसे टकराते समय अथवा "मैरी गो राउण्ड झूले" में गति करते समय, अनुभव करते हैं। इस सहजानुभूत धारणा से चलकर बल की सही वैज्ञानिक संकल्पना तक पहुँचना सहज कार्य नहीं है। आद्य विचारकों जैसे अरस्तू की बल के विषय में संकल्पना गलत थी । बल के विषय में हमें सही धारणा न्यूटन के गति के प्रसिद्ध नियमों में मिली। उन्होंने दो पिण्डों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल के लिए सुस्पष्ट सूत्र भी दिया। अनुवर्ती अध्यायों में हम इनके विषय में अध्ययन करेंगे।
गुरुत्वाकर्षण बल?
गुरुत्वाकर्षण बल किन्हीं दो पिण्डों के बीच उनके द्रव्यमानों के कारण लगने वाला आकर्षण बल है। यह एक सार्वत्रिक बल है। विश्व में प्रत्येक पिण्ड प्रत्येक अन्य पिण्ड के कारण बल का अनुभव करता है। उदाहरण के लिए, इस पृथ्वी पर रखी प्रत्येक वस्तु पृथ्वी के कारण गुरुत्व बल का अनुभव करती है। विशेष बात यह है कि पृथ्वी के परितः चन्द्रमा तथा मानव निर्मित उपग्रहों की गति, सूर्य के परितः पृथ्वी तथा ग्रहों की गति और वास्तव में, पृथ्वी पर गिरते पिण्डों की गति गुरुत्व बल द्वारा ही नियंत्रित होती है। विश्व की बृहत् स्तर की परिघटनाओं जैसे तारों, मंदाकिनियों तथा मंदाकिनीय गुच्छों के बनने तथा विकसित होने में इस बल की प्रमुख भूमिका होती है।
विधुत चुम्बकीय बल?
विद्युत चुम्बकीय बल आवेशित कणों के बीच लगने वाला बल है। सरल प्रकरण में, जब आवेश विरामावस्था में होते हैं, तो इस बल को कूलॉम-नियम द्वारा व्यक्त किया जाता है : "सजातीय आवेशों में प्रतिकर्षण तथा विजातीय आवेशों में आकर्षण"। गतिशील आवेश चुम्बकीय प्रभाव उत्पन्न करते हैं तथा चुम्बकीय क्षेत्र गतिशील आवेशों पर बल आरोपित करते हैं। व्यापक रूपविधुत चुम्बकीय बल से, वैद्युत तथा चुम्बकीय प्रभाव अविच्छेद हैं- इसीलिए इस बल को विद्युत चुम्बकीय बल कहते हैं | गुरुत्वाकर्षण बल की भांति विद्युत चुम्बकीय बल भी काफी लंबी दूरियों तक कार्यरत रहता है तथा इसे किसी मध्यवर्ती माध्यम की भी आवश्यकता नहीं होती । गुरुत्व बल की तुलना में यह बल कहीं अधिक प्रबल होता है। उदाहरण के लिए, किसी निश्चित दूरी के लिए दो प्रोटॉनों के बीच का वैद्युत बल उनके बीच लगे गुरुत्वाकर्षण बल का 10^36 गुना होता है।
गुरुत्वाकर्षण बल सदैव ही आकर्षी बल होता है, जबकि विद्युत चुम्बकीय बल आकर्षी अथवा प्रतिकर्षी भी। इसको इस प्रकार भी कह सकते हैं कि द्रव्यमान केवल एक ही प्रकार(ऋणात्मक द्रव्यमान जैसा कुछ नहीं है।) का होता है, जबकि आवेश दो प्रकार के होते हैं : धनावेश तथा ऋणावेश । यही इन सभी अंतरों का कारण है। द्रव्य अधिकांशतः वैद्युत उदासीन (नेट आवेश शून्य होता है) होता है। इस प्रकार वैद्युत बल अधिकांश रूप में शून्य होता है तथा पार्थिव परिघटनाओं में गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभुत्व रहता है । वैद्युत बल स्वयं वातावरण, जहाँ परमाणु आयनीकृत होते हैं, में प्रकट होता है और इसी के कारण तड़ित दमकती है।
प्रबल नाभिकीय बल:
नाभिक में प्रबल नाभिकीय बल प्रोटॉनों तथा न्यूट्रॉनों को बांधे रखता है। स्पष्ट है कि बिना किसी आकर्षी बल के. प्रोटॉनों में पारस्परिक प्रतिकर्षण होने के कारण, कोई भी नाभिक असंतुलित हो जाएगा। चूंकि वैद्युत बलों की तुलना में गुरुत्व बल उपेक्षणीय होता है, अतः यह बल गुरुत्वाकर्षण बल नहीं हो सकता। अतः एक नवीन बल की योजना बनाना आवश्यक है।
नाभिक में प्रबल नाभिकीय बल प्रोटॉनों तथा न्यूट्रॉनों को बांधे रखता है। स्पष्ट है कि बिना किसी आकर्षी बल के, प्रोटॉनों में पारस्परिक प्रतिकर्षण होने के कारण, कोई भी नाभिक असंतुलित हो जाएगा। चूंकि वैद्युत बलों की तुलना में गुरुत्व बल उपेक्षणीय होता है, अतः यह बल गुरुत्वाकर्षण बल नहीं हो सकता। अतः एक नवीन बल की योजना बनाना आवश्यक है।
दुर्बल नाभिकीय बल
दुर्बल नाभिकीय बल केवल निश्चित नाभिकीय प्रक्रियाओं, जैसे किसी नाभिक के B क्षय में प्रकट होते हैं। B क्षय में नाभिक एक इलेक्ट्रॉन तथा एक अनावेशित कण, जिसे न्यूट्रिनों कहते हैं, उत्सर्जित करता है। दुर्बल नाभिकीय बल गुरुत्वाकर्षण बल जितना दुर्बल नहीं होता, परन्तु प्रबल नाभिकीय तथा विद्युत चुम्बकीय बलों से काफी दुर्बल होता है। दुर्बल नाभिकीय बल का परिसर अत्यंत छोटा, 10 "m कोटि का है।
* सबसे दुर्बल बल- गुरुत्वाकर्षण बल
Quiz1 Question 1
निम्नलिखित में से कौन सी भौतिकी की शाखा नहीं है ?
(A) यांत्रिकी ( Mechanics)
(B) प्रकाशिकी (OP+icS)
ICT साइटोजेनेटिक्स
(D) विद्युत यांत्रिकी|ects Mechanics)
Quiz1 Question 2
भौतिकी के अध्ययन में शामिल है ?
(A) पादप
(B) मनुष्य
(C) पक्षी तथा जीव (D) प्रकृति


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